चाइना जैसी ही आबादी, सस्ता लेबर, कच्चा माल — फिर भी दुनिया का 28% सामान चाइना बनाता है और हम सिर्फ 3%। ये फर्क सिर्फ किस्मत का नहीं है।
यार, ये सवाल मेरे दिमाग में बहुत पहले से चल रहा था। Jharkhand, Dhanbad में बड़ा हुआ, देखा कि जो शर्ट यहाँ के दर्जी सिलते थे — वो अब ग्वांगझू के किसी गोदाम से आती है। वो दर्जी की दुकान बंद हो गई। और उसकी जगह जो फैक्ट्री आ सकती थी — वो कभी आई ही नहीं।
सवाल सीधा है — हमारे पास वो सब कुछ था जो चाइना के पास था। सस्ता लेबर, बड़ी आबादी, कच्चा माल। फिर भी आज चाइना दुनिया की फैक्ट्री है और हम? बस तमाशा देख रहे हैं। चलो, बिना घुमाए सीधे सात असली वजहें बताता हूँ।
दुनिया के कुल मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट का (2023)
भारत — वैश्विक हिस्सा: 3%
सात असली वजहें — बिना लाग-लपेट के
1. ज़मीन अधिग्रहण — फैक्ट्रियों का कब्रिस्तान
जब भी कोई बड़ी कंपनी किसी राज्य में फैक्ट्री लगाने आती है तो सबसे पहला झगड़ा ज़मीन का होता है। लोग अपनी जमीन नहीं देना चाहते — और ये उनका हक भी है। लेकिन असली खेल तब शुरू होता है जब नेता आकर उन लोगों का साथ देने का नाटक करता है, हल्ला मचाता है, और लास्ट में चुपचाप कंपनी से पैसा लेकर सेटलमेंट कर लेता है। न किसानों का भला हुआ, न फैक्ट्री आई। टाटा नैनो का किस्सा याद है सिंगूर में? वही हुआ। और ऐसे कितने किस्से होंगे जो अखबार में भी नहीं आए।
2. लेबर लॉ — जो कंपनियों को छोटा रखने पर मजबूर करता है
चाइना में एकदम सीधा नियम है — काम करो तो पैसा मिलेगा, नहीं तो नहीं। इंडिया में पुराने इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट के तहत अगर फैक्ट्री में 100 से ज़्यादा मजदूर हैं तो किसी को हटाने के लिए भी सरकारी इजाज़त चाहिए। सोचो — सरकारी इजाज़त। इसीलिए कंपनियाँ जानबूझकर 99 से कम मजदूर रखती थीं। नतीजा? इंडिया में बड़े पैमाने की फैक्ट्री कल्चर कभी बनी ही नहीं। चाइना में एक फैक्ट्री में 50,000 लोग काम करते हैं — हमारी "बड़ी" फैक्ट्री में 200।
"इंडिया ने सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री बनाई और उसे इंडस्ट्रियलाइज़ेशन समझ लिया। ये गलती थी। सॉफ्टवेयर एक्सपोर्ट से बंदरगाह नहीं बनते, इलेक्ट्रीशियन नहीं ट्रेन होते, और सप्लाई चेन नहीं बनती।"
कुशल कारखाना मजदूरों की कमी अब भी बड़ी चुनौती है।
3. इन्फ्रास्ट्रक्चर — बिजली नहीं, सड़क नहीं, तो फैक्ट्री कैसे?
चाइना ने पहले हाइवे, बंदरगाह और 24 घंटे बिजली बनाई — उसके बाद फैक्ट्रियाँ बुलाईं। हमारे यहाँ 2020 तक बहुत सारे इंडस्ट्रियल ज़ोन में 8-8 घंटे के पावर कट होते थे। कोई विदेशी कंपनी ₹200 करोड़ की मशीन लगाएगी और बिजली नहीं आएगी? वो सीधे वियतनाम चली जाएगी। इंडिया में लॉजिस्टिक्स लागत GDP का करीब 13-14% है — चाइना में 8%। मतलब हमारा माल बिकने से पहले ही महँगा हो जाता है।
4. हमने सर्विस चुनी — और ये गलत नहीं था, पर मैन्युफैक्चरिंग छूट गई
90s में जब चाइना फैक्ट्रियाँ लगाने में जुटा था, हमने IT और सॉफ्टवेयर चुना। इंफोसिस, TCS, विप्रो — दुनिया में नाम हुआ। करोड़ों इंजीनियरों को नौकरी मिली। ये जीत थी — सच में। लेकिन इस जीत की कीमत ये रही कि मैन्युफैक्चरिंग की तरफ न सरकार ने ध्यान दिया, न समाज ने। फैक्ट्री वाला काम "गंदा" और "कम पढ़े-लिखों का काम" समझा जाने लगा। और इस सोच ने एक पूरी पीढ़ी को प्रोग्रामर बना दिया जो फैक्ट्री सिस्टम बना सकते थे।
भारत के बंदरगाहों में सुधार हुआ है, लेकिन चाइना की तुलना में अभी भी बहुत पीछे हैं। Photo: Unsplash
5. एजुकेशन — इंजीनियर बनाए, फैक्ट्री वर्कर नहीं
चाइना ने 30 साल पहले वोकेशनल ट्रेनिंग सिस्टम बनाया — CNC मशीन चलाना, वेल्डिंग, क्वालिटी कंट्रोल। हमारा एजुकेशन सिस्टम आज भी किताबी है। इंडियन इंजीनियर किताब में पढ़ा हुआ बोल सकता है, हाथ से करके दिखाना मुश्किल हो जाता है। जो बंदा टेक्सटाइल लूम चलाए, इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबल करे — उसे ट्रेन करने की किसी ने नहीं सोची। उसे कहा गया, "कंप्यूटर सीख।"
6. राजनीति — ज़्यादा भाषण, कम काम
चाइना ने 40 साल पहले मैन्युफैक्चरिंग का प्लान बनाया और आज तक उस पर चल रहा है। कोई डिबेट नहीं, कोई यू-टर्न नहीं। हमारे यहाँ हर 5 साल में सरकार बदलती है, हर नई सरकार पुरानी की नीतियाँ पलट देती है। जो विदेशी कंपनी 15 साल की निश्चितता चाहती है वो भारत में आने से डरती है — क्योंकि कल कोई नई सरकार आएगी और नियम बदल देगी। नेता बोलते बहुत हैं, करते 10% भी नहीं।
7. पेपरवर्क और घूसखोरी — बिजनेस शुरू करना अगर सज़ा लगे तो
चाइना में फैक्ट्री लगाने का अप्रूवल कुछ हफ्तों में मिल जाता है — एक विंडो, कम डॉकोमेंट्स। इंडिया में? पर्यावरण NOC, फायर डिपार्टमेंट, नगर पालिका, राज्य सरकार, केंद्र — हर जगह लाइन। और हर लाइन में कोई न कोई है जिसे "ऊपरी खर्चा" चाहिए। लोकल नेता से लेकर पटवारी तक — सबको "मैनेज" करना होता है। बहुत सारी विदेशी कंपनियों ने 2000 के दशक में इंडिया को एवैल्यूएट किया, हिसाब लगाया, और चुपचाप शंघाई का टिकट बुक कर लिया।
🌱 लेकिन अब कुछ बदल भी रहा है — और ये असली है
Apple अब तमिलनाडु में iPhone असेंबल करवा रहा है। Samsung नोएडा में बड़ा कर रहा है। PLI स्कीम से सच में निवेश आ रहा है। PM गति शक्ति से इन्फ्रास्ट्रक्चर प्लानिंग बेहतर हो रही है। नए लेबर कोड्स आए हैं। चाइना महँगा होता जा रहा है — पहली बार इंडिया सच में कॉम्पिटिटिव दिख रहा है। खिड़की खुली है। सवाल ये है कि हम इसमें से दौड़ेंगे या फिर कमेटी बनाकर 10 साल और बर्बाद करेंगे।
आखिरी बात
मेरे पिताजी के मोहल्ले का दर्जी कब का चला गया। लेकिन आज तमिलनाडु में कोई लाइन वर्कर iPhone में कैमरा मॉड्यूल फिट कर रहा है जो अमेरिका में बिकेगा। ये छोटी बात नहीं है। ये शुरुआत है।
बस ये शुरुआत बनती रहे — और हमारे नेता इसे ज़मीन विवाद, घूस और भाषणों में बर्बाद न कर दें।